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October 17, 2026
7 वर्षों से दबे 38 लाख के संबल घोटाले का किया पर्दाफाश
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7 वर्षों से दबे 38 लाख के संबल घोटाले का किया पर्दाफाश

Oct 11, 2026

प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार 17 पीड़ित परिवारों के मसीहा बनीं जनपद अध्यक्ष: 7 वर्षों से दबे 38 लाख के संबल घोटाले का किया पर्दाफाश

कॉर्न सिटी। जुन्नारदेव। विगत सात वर्षों से प्रशासनिक फाइलों और अमानवीय उपेक्षा की धूल फांक रहे 17 निर्धन व पीड़ित जनजातीय, गरीब एवं असहाय परिवारों की न्याय की लड़ाई को जनपद पंचायत जुन्नारदेव की अध्यक्ष श्रीमती सविता अशोक बोसम ने अपने हाथों में लिया है। अब तक किसी भी जिम्मेदार जनप्रतिनिधि या प्रशासनिक अधिकारी ने इन बेबस परिवारों की सुध नहीं ली थी, परंतु जनपद अध्यक्ष ने इस अत्यंत संवेदनशील मामले को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए निर्णायक पहल की है। उनके इस भगीरथ प्रयास से जल्द ही 17 पीड़ित परिवारों को उनका हक और ₹38,00,000/- की लंबित अनुग्रह सहायता राशि प्राप्त होने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

7 वर्षों तक जनपद में दबा रहा मामला, 4 सीईओ बदले पर किसी ने नहीं सुनी पीड़ा
संबल योजनांतर्गत वर्ष 2018-2019 के दौरान अकाल मृत्यु का शिकार हुए असंगठित श्रमिकों के 17 स्वीकृत प्रकरणों को जनपद पंचायत प्रशासन द्वारा विगत सात वर्षों से जानबूझकर दबाकर रखा गया था। इस लंबी अवधि के दौरान जनपद पंचायत में तीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी बदल गए और वर्तमान चौथी सीईओ भी विगत चार वर्षों से पदस्थ हैं, लेकिन किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने इन गरीब परिवारों को राशि दिलाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए।
हितग्राहियों द्वारा बार-बार चक्कर लगाने के बावजूद मैदानी अमले और जिम्मेदार अधिकारियों ने केवल आश्वासन का खेल खेला। यदि समय-सीमा के भीतर आवेदनों की सही तरीके से जाँच कर ली जाती, तो इन गरीब परिवारों को वर्षों पूर्व सहायता राशि मिल चुकी होती। इस घोर विलंब और लापरवाही की पूरी जिम्मेदारी जनपद पंचायत प्रबंधन की है।

संबल योजना के स्वीकृत अधिकारों पर सर्वे की गलत कुल्हाड़ी
मामले की तह तक पहुंचते हुए जनपद अध्यक्ष ने उजागर किया कि वर्ष 2018-19 में ही इन सभी 17 हितग्राहियों के ऑनलाइन अनुग्रह सहायता आदेश (जैसे स्वीकृति आदेश क्र. 126567) विधिवत जारी हो चुके थे। योजना के वैधानिक नियमों के अनुसार, जब तक पूर्व से स्वीकृत प्रकरणों की राशि का अंतिम भुगतान हितग्राही या उसके आश्रित के खाते में नहीं हो जाता, तब तक किसी भी नए भौतिक सत्यापन के आधार पर उनका नाम सूची से नहीं हटाया जा सकता।
परंतु, शासन द्वारा कराए गए भौतिक सत्यापन में मैदानी टीम ने घोर लापरवाही बरतते हुए 2018-19 में स्वर्गवासी हो चुके श्रमिकों को “मौके पर गैर-मौजूद” दर्शाकर योजना से हटा दिया। जो व्यक्ति वर्षों पहले मृत हो चुका हो, वह सर्वे में सशरीर कैसे उपस्थित मिल सकता था? सर्वे टीम के इस हास्यास्पद कृत्य के कारण ये सभी श्रमिक “अपात्र” दर्ज हो गए।

बिना पढ़े फाइलों पर हस्ताक्षर और ‘अपील’ का नया प्रशासनिक बहाना
शासकीय पत्राचार-पत्र क्र. 2614/2023 जो श्रम अधिकारी छिन्दवाड़ा को संबोधित है, की सूक्ष्म जाँच में यह शर्मनाक तथ्य भी सामने आया कि सूची के क्रमांक 01 से 09 तक के प्रकरणों में मृत्यु की तिथि बाद की है और सहायता राशि की स्वीकृति मृत्यु की तिथि से महीनों पहले दर्ज दिखाई गई है। जैसे
स्व. श्रीमती बिस्तारिया शीलू, ग्राम मनकूघाटी की मृत्यु 03 अक्टूबर 2019 को दर्ज है, जबकि स्वीकृति 24 फरवरी 2019 (8 माह पूर्व) दर्शा दी गई।
स्व. रकन्सा कुमरे (ग्राम इकलासानी) की मृत्यु 22 अगस्त 2019 को हुई, जबकि स्वीकृति 21 अगस्त 2019 दर्ज है।

यह सीधा प्रमाण है कि जिम्मेदार अधिकारियों ने बिना पढ़े और बिना फाइलों का अवलोकन किए आँख मूँदकर कूट-रचित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। अब अपनी नाकामी छिपाने के लिये प्रकरणों को ‘अपील में ले जाने’ का बहाना बनाया जा रहा है, जबकि पूर्व से स्वीकृत मामलों में अपील का कोई वैधानिक औचित्य ही नहीं बनता; केवल आवंटन प्राप्त कर सीधा भुगतान निष्पादित किया जाना है।

जनपद अध्यक्ष का अल्टीमेटम और समाधान का रास्ता
जनपद अध्यक्ष श्रीमती सविता अशोक बोसम ने स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक अधिकारियों की गलती का खमियाजा गरीब, असहाय आदिवासी भुगतने को मजबूर नहीं होंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश शासन, मुख्य सचिव, मध्यप्रदेश शासन, प्रमुख सचिव, श्रम विभाग, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल, आयुक्त, जबलपुर सभांग जबलपुर एवं कलेक्टर छिंदवाड़ा के समक्ष समाधान का स्पष्ट मार्ग रखा है कि राज्य शासन तुरंत जनपद पंचायत जुन्नारदेव को विशेष आवंटन जारी करे। शासन से प्राप्त आवंटन और जनपद में उपलब्ध संबल मद की राशि को मिलाकर इन 17 परिवारों को तुरंत भुगतान किया जाए।

जनपद अध्यक्ष ने चेतावनी दी है कि यदि 30 दिवस के भीतर ₹38,00,000/- की लंबित राशि का 12% ब्याज सहित भुगतान नहीं किया जाता और कूट-रचित आंकड़ों पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं होती, तो वे स्वयं इन 17 पीड़ित जनजातीय गरीब, असहाय परिवारों को साथ लेकर माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर में याचिका दायर करेंगी तथा लोकायुक्त व ईओडब्ल्यू में आपराधिक प्रकरण दर्ज कराएंगी।